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आने वाला कल देखा था

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शाम क बितता हुआ लम्हा गुजरता हुआ पल - पल हमेशा बताता है की आने वाला है एक और कल रात के पहर में , थोरी देर पहले इसी दिन के दोपहर में गुजरता हुआ पल देखा था यू कहो , आने वाला कल देखा था हाँ कल देखा था रेत की बुनियाद पर बनी ईंट का महल देखा था उसी वक्त , उसमे बनी दरार से झांकती हुए किरणों का दल देखा था एक हीं  पल में हमने बिता हुआ कल देखा था बालो को सवारती , हटाती आंखो से शर्माती , बदन को चुराती उसका अपूर्व सौंदर्य देखा था उस पल हमने उसमे आने वाला कल देखा था भीड़ के बिच से गुजरती हुए , भेरो के झुंड की तरह आदमियों की भीड़ , वंही किसी गिरी हुए चीज़  को पकड़ने की चाह देखा था , धन का गुब्बार   देखा था कल को छोड़ते  हुए , फिर एक नया कल देखा था रात आइने के सामने ख़ुद को देखते हुए गुज़रता हुआ पल देखा था  आने वाला कल देखा था  ----------श्वेताभ रंजन -----...