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प्रियतम बुलाना चाहता हूँ....

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तुमको पहले बार कहते हुए डरता हूँ मैं.... हर बार तुम्हारा नाम, ख़ुद से कहता हूँ मैं....... आज तोड़ना चाहता हूँ खामोशी की दीवारों को...... हाँ तुम्हे प्रियतम कह बुलाना चाहता हूँ मैं.... ख़ुद से हर बार कह कर चुप सा हो जाता हूँ मैं.... तुम्हारे साथ चलते चलते रुक सा जाता हूँ मैं.... आज पहले बार,... हाँ पहले बार... तुम्हे प्रियतम कह बुलाना चाहता हूँ मैं...... अपने सिने में उठे इस शब्द को उतारना चाहता हूँ मैं... बहुत बेचैनी है मेरे लबो पे ........ बहुत अक्षरों का मेल हो रहा है.... शब्द बन गए है, ख़ुद को अब रोकना नही चाहता हूँ मैं..... आज पहले बार, हाँ पहले बार..... प्रियतम तुम्हे....प्रियतम बुलाना चाहता हूँ मैं....... ...................श्वेताभ रंजन............

तलाश ........

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आज के इंसान के भीतर इन्शानियत की लाश है....... सडको पर चलते हुए, गिरे हुए पत्थर की तरह...... मेरे पास चोट है, दर्द है, पीडा है......................... बस कराह का अभाव है....................... हाँ बेसक मैं बंद कमरों में बजा राग हूँ ............... मैं बजा करता हूँ चोट पे, दर्द पे, ........................ मुझे तलाश है इन्शानियत के लाश की....... क्यूंकि मैं उससे पुच सकू....उससे उसके निर्माण के बारे में..... की तू इतना अल्पायु क्यों हुआ ......? इंसान के पहले ही क्यों मर गया....? भगवन ने क्यों दिया तुझे ये अभिशाप है......? हज़ार उलझने , अन्गिनंत प्रश्नों के उतर की आश है....... इसलिए तलाश है इन्शानियत के लाश की ................ ....... श्वेताभ रंजन ........