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व्यवस्था सुन रहे हो तुम ------श्वेताभ रंजन ------------------- व्यवस्था सुन रहे हो तुम सड़क पे तुम्हारी मौत धाराओ के धागो से कई गाँठ वक़्त का लम्बा फैेलाव सब गाँठे छुट गई कई रगड़ कर टूट गई व्यवस्था सुन रहे हो तुम महाभारत में जुए में हार पांडवो को वनवास ,अज्ञातवास वो सजा जिसमे वक़्त पसर जाता है मजबूती से फिर गुनहगार भी लड़ जाता है व्यवस्था सुन रहे हो तुम नींद के आगोश में सदा के लिए जाना कितना आसान बा-मुश्किल चंद लम्हा फिर उसकी बेचैनी की हर रात ता-उम्र व्यवस्था सुन रहे हो तुम जा ये मैं क्या लिख गया कलम से अश्रु क्यूँ गिर गया चोट फिर लगी नोक पे दर्द फिर हुआ उसी चोट पे व्यवस्था सुन रहे हो तुम तुम निष्प्राण क्यूँ हो मेज पर पड़ते हथौड़े निर्जीव काठ से क्यूँ हैं व्यवस्था सुन रहे हो तुम धरकने दिल में होती है दिल होता तो तुझमे भी होती शायद तुम किसी बचपन से नहीं गुजरे व्यवस्था सुन रहे हो तुम हाँ तुम ,कभी - काश तुम्हे भी कुचला जाता तुम्हे भी नींद के आगोश में जाना होता बा-मुश्किल चंद लम्हा फिर तुम्हारी बेचैनी क...
चलो गौर से फिर मंदिर-मस्जिद निहारा जाये गुमराह शिरत को फिर आइने में उतारा जाए सिर्फ भूख से की खुदखुशी वाज़िब नहीं लगती चलो हर एक इल्ज़ाम का  मजहब बनाया जाए ---------------------- श्वेताभ रंजन
कवि के कोख से निकली कविता प्रसव के दर्द को साझा करेगी शब्द के कोण ,समझ सको ग़र तुम लम्हा ,लम्हा तुम्हे जिन्दा करेगी ----------------श्वेताभ रंजन
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"MAGGI" ---------------------- श्वेताभ रंजन मैग्गी तुम दो मिनट रुक जाओ आवो इधर आवो कंही शांत बैठते हैं तुम्हारे आँसुओ को पोछते  हैं तुम्हारे दर्द सी हीं दस्तक कुछ तुम्हारे आने पे थी, आज  तुम्हारे जाने पे है तुम आये , तुम्हारे आने से पहले  माँ की हाथो का बना दलिया वो आटे  का हलवा.......... उपमा ,डोसा वो बेसन का पापड़ बारिश की सुहानी शाम चाय के साथ पकौड़ी की शान रोज शाम कुछ नया कुछ बेहतर तुम आये तो सब ख़त्म हर भूख बस दो मिनट में शाँत  फिर भी कई भूख से मरे  मैग्गी तुम मत रोओ बच्चो के बीच तुम हँसते खेलते बटते थे क्यूंकि तुम दो मिनट में पकते थे पर तुममे वो स्वाद कँहा था तुम ग्लैमर पर बिकते थे तुम दो मिनट में जो  पकते थे तुम्हे भी इंसान की तरह संघर्ष करना था हर घड़ी अग्नि परीक्षा पास करना था पहले भी कई बार तुम फेल हुए होगे पर शोर इस बार कुछ ज्यादा था मत घबराओ शोर के थम जाने  का इंतज़ार करो अब दो नहीं एक मिनट में पक जाने की बात करो देखना कुछ न कुछ सेट्लमेंट होगा  वक़्त दर वक़्त लोग  सब भूल जायेंगे बच्चे ,...
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 कुदरत समंदर के आगोश में लहरो का समां जाना फिर बेचैन होकर उनका साहिलों से टकरा जाना अपने आप से जूझना ,फिर खुद में खो जाना हवाओं के  शोर का  ,तूफ़ान में लिपट जाना बादलो का गरजना ,फिर एकाएक बरस जाना इंसान को समझने की कुदरत की  हर कोशिश और उन कोशिशो का कामयाब हो जाना आइने में पुरानी सुरत की तलाश और उसी तलाश में, अतीत में खो जाना इंसान की फितरत से कुदरत का वाकिफ होना कुदरत से बनना ,कुदरत में हीं  समां जाना -----------------------------------श्वेताभ रंजन

आने वाला कल देखा था

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शाम क बितता हुआ लम्हा गुजरता हुआ पल - पल हमेशा बताता है की आने वाला है एक और कल रात के पहर में , थोरी देर पहले इसी दिन के दोपहर में गुजरता हुआ पल देखा था यू कहो , आने वाला कल देखा था हाँ कल देखा था रेत की बुनियाद पर बनी ईंट का महल देखा था उसी वक्त , उसमे बनी दरार से झांकती हुए किरणों का दल देखा था एक हीं  पल में हमने बिता हुआ कल देखा था बालो को सवारती , हटाती आंखो से शर्माती , बदन को चुराती उसका अपूर्व सौंदर्य देखा था उस पल हमने उसमे आने वाला कल देखा था भीड़ के बिच से गुजरती हुए , भेरो के झुंड की तरह आदमियों की भीड़ , वंही किसी गिरी हुए चीज़  को पकड़ने की चाह देखा था , धन का गुब्बार   देखा था कल को छोड़ते  हुए , फिर एक नया कल देखा था रात आइने के सामने ख़ुद को देखते हुए गुज़रता हुआ पल देखा था  आने वाला कल देखा था  ----------श्वेताभ रंजन -----...

प्रियतम बुलाना चाहता हूँ....

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तुमको पहले बार कहते हुए डरता हूँ मैं.... हर बार तुम्हारा नाम, ख़ुद से कहता हूँ मैं....... आज तोड़ना चाहता हूँ खामोशी की दीवारों को...... हाँ तुम्हे प्रियतम कह बुलाना चाहता हूँ मैं.... ख़ुद से हर बार कह कर चुप सा हो जाता हूँ मैं.... तुम्हारे साथ चलते चलते रुक सा जाता हूँ मैं.... आज पहले बार,... हाँ पहले बार... तुम्हे प्रियतम कह बुलाना चाहता हूँ मैं...... अपने सिने में उठे इस शब्द को उतारना चाहता हूँ मैं... बहुत बेचैनी है मेरे लबो पे ........ बहुत अक्षरों का मेल हो रहा है.... शब्द बन गए है, ख़ुद को अब रोकना नही चाहता हूँ मैं..... आज पहले बार, हाँ पहले बार..... प्रियतम तुम्हे....प्रियतम बुलाना चाहता हूँ मैं....... ...................श्वेताभ रंजन............