Posts

Showing posts from 2017
व्यवस्था सुन रहे हो तुम ------श्वेताभ रंजन ------------------- व्यवस्था सुन रहे हो तुम सड़क पे तुम्हारी मौत धाराओ के धागो से कई गाँठ वक़्त का लम्बा फैेलाव सब गाँठे छुट गई कई रगड़ कर टूट गई व्यवस्था सुन रहे हो तुम महाभारत में जुए में हार पांडवो को वनवास ,अज्ञातवास वो सजा जिसमे वक़्त पसर जाता है मजबूती से फिर गुनहगार भी लड़ जाता है व्यवस्था सुन रहे हो तुम नींद के आगोश में सदा के लिए जाना कितना आसान बा-मुश्किल चंद लम्हा फिर उसकी बेचैनी की हर रात ता-उम्र व्यवस्था सुन रहे हो तुम जा ये मैं क्या लिख गया कलम से अश्रु क्यूँ गिर गया चोट फिर लगी नोक पे दर्द फिर हुआ उसी चोट पे व्यवस्था सुन रहे हो तुम तुम निष्प्राण क्यूँ हो मेज पर पड़ते हथौड़े निर्जीव काठ से क्यूँ हैं व्यवस्था सुन रहे हो तुम धरकने दिल में होती है दिल होता तो तुझमे भी होती शायद तुम किसी बचपन से नहीं गुजरे व्यवस्था सुन रहे हो तुम हाँ तुम ,कभी - काश तुम्हे भी कुचला जाता तुम्हे भी नींद के आगोश में जाना होता बा-मुश्किल चंद लम्हा फिर तुम्हारी बेचैनी क...