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चलो गौर से फिर मंदिर-मस्जिद निहारा जाये गुमराह शिरत को फिर आइने में उतारा जाए सिर्फ भूख से की खुदखुशी वाज़िब नहीं लगती चलो हर एक इल्ज़ाम का  मजहब बनाया जाए ---------------------- श्वेताभ रंजन