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Showing posts from 2015
चलो गौर से फिर मंदिर-मस्जिद निहारा जाये गुमराह शिरत को फिर आइने में उतारा जाए सिर्फ भूख से की खुदखुशी वाज़िब नहीं लगती चलो हर एक इल्ज़ाम का  मजहब बनाया जाए ---------------------- श्वेताभ रंजन
कवि के कोख से निकली कविता प्रसव के दर्द को साझा करेगी शब्द के कोण ,समझ सको ग़र तुम लम्हा ,लम्हा तुम्हे जिन्दा करेगी ----------------श्वेताभ रंजन
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"MAGGI" ---------------------- श्वेताभ रंजन मैग्गी तुम दो मिनट रुक जाओ आवो इधर आवो कंही शांत बैठते हैं तुम्हारे आँसुओ को पोछते  हैं तुम्हारे दर्द सी हीं दस्तक कुछ तुम्हारे आने पे थी, आज  तुम्हारे जाने पे है तुम आये , तुम्हारे आने से पहले  माँ की हाथो का बना दलिया वो आटे  का हलवा.......... उपमा ,डोसा वो बेसन का पापड़ बारिश की सुहानी शाम चाय के साथ पकौड़ी की शान रोज शाम कुछ नया कुछ बेहतर तुम आये तो सब ख़त्म हर भूख बस दो मिनट में शाँत  फिर भी कई भूख से मरे  मैग्गी तुम मत रोओ बच्चो के बीच तुम हँसते खेलते बटते थे क्यूंकि तुम दो मिनट में पकते थे पर तुममे वो स्वाद कँहा था तुम ग्लैमर पर बिकते थे तुम दो मिनट में जो  पकते थे तुम्हे भी इंसान की तरह संघर्ष करना था हर घड़ी अग्नि परीक्षा पास करना था पहले भी कई बार तुम फेल हुए होगे पर शोर इस बार कुछ ज्यादा था मत घबराओ शोर के थम जाने  का इंतज़ार करो अब दो नहीं एक मिनट में पक जाने की बात करो देखना कुछ न कुछ सेट्लमेंट होगा  वक़्त दर वक़्त लोग  सब भूल जायेंगे बच्चे ,...
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 कुदरत समंदर के आगोश में लहरो का समां जाना फिर बेचैन होकर उनका साहिलों से टकरा जाना अपने आप से जूझना ,फिर खुद में खो जाना हवाओं के  शोर का  ,तूफ़ान में लिपट जाना बादलो का गरजना ,फिर एकाएक बरस जाना इंसान को समझने की कुदरत की  हर कोशिश और उन कोशिशो का कामयाब हो जाना आइने में पुरानी सुरत की तलाश और उसी तलाश में, अतीत में खो जाना इंसान की फितरत से कुदरत का वाकिफ होना कुदरत से बनना ,कुदरत में हीं  समां जाना -----------------------------------श्वेताभ रंजन