"MAGGI"
---------------------- श्वेताभ रंजन

मैग्गी तुम दो मिनट रुक जाओ
आवो इधर आवो कंही शांत बैठते हैं
तुम्हारे आँसुओ को पोछते  हैं
तुम्हारे दर्द सी हीं दस्तक कुछ
तुम्हारे आने पे थी,
आज  तुम्हारे जाने पे है

तुम आये , तुम्हारे आने से पहले
 माँ की हाथो का बना दलिया
वो आटे  का हलवा..........
उपमा ,डोसा वो बेसन का पापड़
बारिश की सुहानी शाम
चाय के साथ पकौड़ी की शान
रोज शाम कुछ नया कुछ बेहतर

तुम आये तो सब ख़त्म
हर भूख बस दो मिनट में
शाँत 
फिर भी कई भूख से मरे

 मैग्गी तुम मत रोओ
बच्चो के बीच तुम हँसते खेलते
बटते थे
क्यूंकि तुम
दो मिनट में पकते थे

पर तुममे वो स्वाद कँहा था
तुम ग्लैमर पर बिकते थे
तुम
दो मिनट में जो  पकते थे

तुम्हे भी इंसान की तरह संघर्ष करना था
हर घड़ी अग्नि परीक्षा पास करना था
पहले भी कई बार तुम फेल हुए होगे
पर शोर इस बार कुछ ज्यादा था

मत घबराओ
शोर के थम जाने  का इंतज़ार करो
अब दो नहीं एक मिनट में पक
जाने की बात करो
देखना कुछ न कुछ सेट्लमेंट होगा 
वक़्त दर वक़्त लोग  सब भूल जायेंगे
बच्चे ,बुढ़े  सब तुम्हे गले लगायेंगे

इंसानी यादाश्त का तुम्हे भी फयदा होगा
किसान गजेन्द्र , जनलोकपाल,दामिनी,उबेर कैब ,
कई घोटालो ,वादो की तरह.......
बेल -जेल-जंग की कहानी में
तुम्हारी ये बात भी भुला दी जाएगी
मैग्गी तुम दो मिनट रुक जाओ
आवो इधर आवो कंही शांत बैठते हैं
तुम्हारे आँसुओ को पोछते  हैं






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