कुदरत


समंदर के आगोश में लहरो का समां जाना
फिर बेचैन होकर उनका साहिलों से टकरा जाना
अपने आप से जूझना ,फिर खुद में खो जाना
हवाओं के  शोर का  ,तूफ़ान में लिपट जाना
बादलो का गरजना ,फिर एकाएक बरस जाना
इंसान को समझने की कुदरत की  हर कोशिश
और उन कोशिशो का कामयाब हो जाना
आइने में पुरानी सुरत की तलाश
और उसी तलाश में, अतीत में खो जाना
इंसान की फितरत से कुदरत का वाकिफ होना
कुदरत से बनना ,कुदरत में हीं  समां जाना
-----------------------------------श्वेताभ रंजन

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