तलाश ........



आज के इंसान के भीतर इन्शानियत की लाश है.......


सडको पर चलते हुए, गिरे हुए पत्थर की तरह......


मेरे पास चोट है, दर्द है, पीडा है.........................


बस कराह का अभाव है.......................


हाँ बेसक मैं बंद कमरों में बजा राग हूँ ...............


मैं बजा करता हूँ चोट पे, दर्द पे, ........................


मुझे तलाश है इन्शानियत के लाश की.......


क्यूंकि मैं उससे पुच सकू....उससे उसके निर्माण के बारे में.....


की तू इतना अल्पायु क्यों हुआ ......?


इंसान के पहले ही क्यों मर गया....?


भगवन ने क्यों दिया तुझे ये अभिशाप है......?


हज़ार उलझने , अन्गिनंत प्रश्नों के उतर की आश है.......


इसलिए तलाश है इन्शानियत के लाश की ................


....... श्वेताभ रंजन ........



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