टुटने के बाद



सोचा था उसने खुद को पुर्जो मे बांट डालेगा...

अपनी कहानी अपने हाथो से फाड़ डालेगा...

कहानी बनने के पहले हिं वो बट गया पुर्जो में...

टुट गया मिट्टी का खिलौना अभी पकने में...

बेइंतहा मोहब्बत थी उसे ज्ञिन्दगी से...

लेकिन टुटने के बाद,

नफरत सी हो गई है उसे, उन खिलौनो से...

जो टुट जाते हैं बिच मझधार में....

------श्वेताभ रंजन-----

Comments

Anonymous said…
shabdon ka khubsurat samanway....... kahte hain kavitayen aayina hoti hain aapke bhaon ki.......
ye tuta hua insaan kon hai
aap to nai ho sakte

Popular posts from this blog

प्रियतम बुलाना चाहता हूँ....